आरोपण अर्थात इंप्लांटेशन वह प्रक्रिया है जो भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद होती है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक गर्भधारण और आईवीएफ (IVF) दोनों में ही समान रूप से होती है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत गर्भधारण के 6 से 12 दिनों बाद निषेचित अंडा गर्भाशय की अंदरूनी सतह पर जाकर चिपक जाता है और वहां वह स्थिर हो जाता है जिसे आरोपण या इंप्लांटेशन कहते हैं।
यह गर्भधारण का पहला चरण है। यहीं से गर्भावस्था की शुरुआत होती है। आरोपण सफल होने के पश्चात महिला के शरीर में कई लक्षण देखे जाते हैं। इस दौरान महिला के शरीर में हार्मोन का भी उतार चढ़ाव होता है। इस प्रक्रिया में भ्रूण गर्भाशय की दीवार या सतह जिसे एंडोमेट्रियम (endometrium) कहते हैं, से चिपक जाता है और एंडोमेट्रियम में कोशिकाएं मौजूद रहती हैं जिसमें दबाव के कारण रक्त वाहिकाएं फट सकती हैं जिसके कारण दर्द और रक्तस्राव हो सकता है।
इम्प्लांटेशन (Implantation) का मतलब होता है भ्रूण का गर्भाशय की अंदरूनी परत से चिपकना और उसमें स्थापित होना। यह प्रक्रिया गर्भधारण के शुरुआती चरण में होती है। जब भ्रूण सफलतापूर्वक गर्भाशय में जुड़ जाता है।
जब अंडाणु और शुक्राणु का निषेचन (fertilisation) होता है तब निषेचन के बाद भ्रूण तैयार होता है और यह भ्रूण गर्भनलिका या फैलोपियन ट्यूब में बनता है और ट्यूब के रास्ते ही गर्भाशय में प्रवेश करता है इसके बाद वह गर्भाशय की भीतरी दीवार जिसे एंडोमेट्रियम कहते हैं, में चिपक जाता है और वहीं स्थिर हो जाता है जिससे गर्भावस्था का आरंभ होता है। प्रत्यारोपण की यह प्रक्रिया निषेचन के 6 से 12 दिनों के अंदर पूरी होती है। इस प्रक्रिया में हार्मोन स्राव का भी बहुत योगदान रहता है जो भ्रूण को फैलोपियन ट्यूब से आगे गर्भाशय की दीवार में चिपकने में मदद करता है।
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समयांतर |
प्रत्यारोपण के चरण |
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D- 1 |
निषेचन या फर्टिलाइजेशन |
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D-3 |
कोशिका विभाजन (Cleavage Stage) |
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D-4- 5 |
मोरुला - कोशिकाओं का गोलाकार रूप में परिवर्तन (Morula) |
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D- 5- 6 |
ब्लास्टोसिस्ट |
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D- 7- 10 |
प्रत्यारोपण अर्थात इंप्लांटेशन |
गर्भधारण का यह सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम चरण है। इस प्रक्रिया में निषेचित अंडा गर्भाशय की दीवार से चिपक जाता है और यह प्रक्रिया ओवुलेशन के बाद ही संभव होती है क्योंकि तभी अंडाणु और शुक्राणु मिलते हैं और निषेचित होते हैं।
आमतौर पर भ्रूण आरोपण की प्रक्रिया पूरी होने में 6 से 12 दिनों का समय लगता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भधारण प्राकृतिक है या आईवीएफ (IVF) के जरिए गर्भधारण किया जा रहा है।
प्राकृतिक तौर पर गर्भधारण करने की स्थिति में ओव्यूलेशन की प्रक्रिया के लगभग एक हफ्ते के भीतर भ्रूण गर्भाशय में आरोपित हो जाता है।
वहीं दूसरी तरफ, यदि आईवीएफ (IVF) के द्वारा गर्भधारण किया गया है तो ऐसी स्थिति में भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद वह लगभग 5 से 10 दिनों के भीतर गर्भाशय की दीवार में आरोपित हो जाता है। निषेचन से भ्रूण प्रत्यारोपण तक की पूरी प्रक्रिया के संपन्न होने में लगभग एक से 14 दिन तक का समय लगता है।
सर्वप्रथम निषेचन के लगभग 24 घंटे बाद कोशिका विभाजन की प्रक्रिया आरंभ होती है और युग्मनज का निर्माण होता है। तीसरे से चौथे दिन कोशिकाओं की एक गोलाकार संरचना बनती है जिसे मोरूला कहते हैं।
4 से 5 दिन में भ्रूण एक खोखली संरचना के रूप में तैयार होता है जिसके दो भाग होते हैं। पहला भाग आंतरिक कोशिका समूह होता है जो शिशु का निर्माण करता है और दूसरा भाग बाहरी परत होता है जिसे ट्राॅफोब्लास्ट कहते हैं और यह प्लेसेंटा का निर्माण करता है।
5 से 6 दिन में ब्लास्टोसिस्ट गर्भाशय की सतह से चिपकना आरंभ कर देता है।
और 6 से 8वें दिन में ब्लास्टोसिस्ट गर्भाशय अंदरूनी परत, जिसे एंडोमेट्रियम कहते हैं, से जुड़ जाता है और वहां स्थिर हो जाता है।
8 से 10वें में दिन वह भ्रूण अपने स्थान पर पूर्ण रूप से आरोपित हो जाता है।
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आरोपण वह प्रक्रिया है जब निषेचित अंडा गर्भाशय की दीवार से जाकर चिपक जाता है। ऐसे में कुछ शारीरिक बदलाव महसूस होना स्वाभाविक है और इन बदलाव के कुछ लक्षण गर्भवती महिला में गर्भधारण के आरंभिक दिनों में दिखाई देते हैं। सामान्य तौर पर जो लक्षण अधिकांश महिलाओं में देखे जाते हैं वह हल्का रक्तस्राव, पेट दर्द, थकान ,स्तनों में सूजन या कोमलता और मनोदशा में अचानक परिवर्तन के साथ-साथ हार्मोन में बदलाव हैं।
भ्रूण आरोपण सफल होने के बाद शरीर कई प्रकार के संकेत देता है, यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हालांकि यह संकेत हर महिला में एक समान नहीं होता। कुछ महिलाओं में संकेत ना के बराबर होते हैं। यह लक्षण आमतौर पर एक से तीन दिनों तक अधिक से अधिक देखे जा सकते हैं। यह हार्मोन के स्राव में उतार-चढ़ाव के कारण होता है। आमतौर पर जो संकेत देखे जाते हैं वह निम्नलिखित हैं -
हालांकि गर्भाशय में भ्रूण के आरोपित होने के लिए लक्षण सामान्य है और यह सफल गर्भधारण के संकेत देते हैं, लेकिन इस बात का दावा नहीं किया जा सकता कि हर महिला में एक समान लक्षण दिखाई दें। हर महिला की अपनी सहनशीलता होती है, उसकी शारीरिक बनावट होती है इसलिए लक्षण भी सब में अलग-अलग नजर आते हैं।
भ्रूण के गर्भाशय की सतह में आरोपित होने के बाद कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं उनमें से रक्त स्राव भी एक प्रमुख लक्षण है लेकिन यह रक्तस्राव मासिक धर्म के रक्त स्राव से बिल्कुल अलग होता है। भ्रूण प्रत्यारोपण या आरोपण में होने वाले रक्त स्राव में खून का रंग हल्का गुलाबी या भूरा होता है और यह एक से तीन दिनों के भीतर ठीक भी हो जाता है साथ ही इसका बहाव भी बहुत ही कम होता है जैसे कि कुछ बूंदें। इसके लिए किसी सैनिटरी पैड की आवश्यकता नहीं पड़ती है और इसका समयांतर अंडाशय से अंडा निकालने के अर्थात ओवुलेशन के 6 से 12 दिनों बाद होता है ।
जबकि मासिक धर्म में होने वाले रक्तस्राव में खून का रंग गाढ़ा लाल होता है, यह तीन से सात दिनों तक का समय लेता है । इसमें रक्त का बहाव भी अत्यधिक होता है। कुछ महिलाओं को तो कई बार सेनेटरी पैड बदलने की जरूरत होती है। इसका समयांतर ओवुलशन के 14 दिन बाद होता है।
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विशेष विवरण |
इंप्लांटेशन के बाद ब्लीडिंग |
मासिक रक्त स्राव या पीरियड्स |
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1 |
रंग |
हल्का गुलाबी या भूरा |
लाल |
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2 |
बहाव |
हल्का |
अत्यधिक तेज |
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3 |
अवधि |
1 से 3 दिन तक |
3 से 7 दिन तक |
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4 |
समयांतर |
ओवुलेशन के 6 से 12 दिन बाद |
ओवुलेशन के 14 दिन बाद |
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लक्षण |
इम्प्लैन्टेशन |
पीरिएड्स |
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खून के थक्के (clots) बनना |
नहीं बनते |
बनते हैं |
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सैनिटरी नैपकिन की आवश्यकता |
हल्का रक्त स्राव अतः नैपकिन आवश्यक नहीं |
कई सेनेटरी नेपकिन की आवश्यकता होती है |
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पेट के निचले हिस्से में क्रैंप की तीव्रता |
बहुत ही हल्की क्रैंप या ऐंठन |
तीव्र ऐंठन कई दिनों तक बनी रहती है |
भ्रूण प्रत्यारोपण या इंप्लांटेशन की प्रक्रिया अंडे के गर्भाशय की दीवार से चिपकना होता है और इस प्रक्रिया के बाद महिला में कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं जो गर्भाधान या अंडाशय से अंडा निकालने के लगभग 6 से 12 दिन बाद दिखता है। हालांकि हर महिला में यह लक्षण एक समान रूप से दिखाई नहीं देते अतः गर्भधारण की पुष्टि के लिए प्रेगनेंसी टेस्ट करना उचित होता है।
आइए इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं।
जी नहीं, हर महिला के शरीर की बनावट उसकी सहनशीलता अलग होती है जब व्यक्ति अलग हो तो उसके लक्षण एक समान कैसे हो सकते हैं। अतः हर महिला में गर्भाशय की सतह पर अंडों के आरोपित होने के लक्षण दिखाई नहीं देते। कुछ में तो यह प्रक्रिया बिल्कुल शांत तरीके से होती है जैसे कुछ अंतर ही ना हुआ हो। यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है की हर महिला के पेट में दर्द हो, उसे मितली(nausea) आती हो या उसे रक्तस्राव या ब्लीडिंग हो तो ऐसे में संदेह पालने से बेहतर है की बीटा एचसीजी टेस्ट करवा कर संदेह और घबराहट की स्थिति से बाहर निकलें। जिनमें लक्षण नहीं दिखाई देते, डॉक्टर उन्हें प्रेगनेंसी टेस्ट करने की सलाह देते हैं।
आईवीएफ में भी लक्षण बिल्कुल प्राकृतिक गर्भधारण की तरह ही होते हैं जैसे हल्का रक्त स्राव या पेट में हल्का दर्द महसूस होना परंतु आईवीएफ के जरिए भ्रूण प्रत्यारोपण करने की स्थिति में प्रोजेस्ट्रॉन और ऐस्ट्रोजेन जैसी हार्मोनल दवाओं का प्रयोग होता है जिसके कारण लक्षणों में अंतर देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया में हुए आरोपित अंडे प्राकृतिक गर्भधारण से कुछ अधिक तकलीफदेह हो सकते हैं जैसे स्तनों में कुछ अधिक दर्द हो या भारीपन महसूस हो मनोदशा में अचानक अत्यधिक परिवर्तन हो चक्कर, जी मचलना या रक्तस्राव थोड़ा अधिक होना अपेक्षित है। हालांकि कई महिलाओं में इस प्रक्रिया के भी कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं।
हालांकि प्रेग्नेंसी टेस्ट 11 से 14 दिनों बाद ही किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया के बाद दो सप्ताह का इंतजार या Two week wait जरूरी होता है क्योंकि इस दौरान भ्रूण गर्भाशय की दीवार से चिपककर स्थिर हो जाता है जिससे रक्त में HCG हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है जिससे प्रेगनेंसी टेस्ट के सकारात्मक आने की संभावना अधिक रहती है ।
भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद शरीर में कई प्रकार के बदलाव दिखाई देते हैं इनमें से पेल्विक क्षेत्र में हल्का दर्द, हल्का रक्त स्राव, स्तनों में सूजन या कोमलता थकान और कमजोरी साथ ही मनोदशा में अचानक परिवर्तन देखा जाता है। जिससे सफल गर्भधारण के संकेत मिलते हैं। कई बार इन लक्षणों के दिखाई देने के पीछे इस प्रक्रिया में दी जानेवाली हार्मोनल दवाएं भी होती हैं।
आईवीएफ यानी in vitro fertilization की प्रक्रिया के दौरान कई तरह की दवाइयां और इंजेक्शन दी जाती हैं हालांकि यह अंडाशय को उत्तेजित करने के लिए दिया जाता है ताकि अंडों का अधिक से अधिक संख्या में निर्माण हो सके और गर्भावस्था की संभावना बढ़ जाए लेकिन इसके कई दुष्प्रभाव भी होते हैं।
भ्रूण के सफल प्रत्यारोपण के बाद महिला यह जानने के लिए इच्छुक रहती है कि उसने सफलता पूर्वक गर्भधारण कर लिया है जिसके लिए वह प्रेगनेंसी टेस्ट करना चाहती है। आमतौर पर 11 से 14 दिनों के बाद प्रेगनेंसी टेस्ट करने की सलाह दी जाती है। इसके लिए वह पेशाब या खून की जांच करवा सकती है जिससे गर्भधारण की पुष्टि हो सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन, WHO, के अनुसार इसके लिए एचसीजी टेस्ट ( HCG test) द्वारा गर्भावस्था की स्थिति को जाना जाता है। भ्रूण प्रत्यारोपण के 11 से 14 दिनों के बीच एचसीजी हार्मोन का स्तर शरीर में बढ़ जाता है जिससे जांच की सही रिपोर्ट आने की संभावना भी बढ़ जाती है हालांकि हर रोगी के लिए एक जैसे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती है।
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विशेषताएं |
पेशाब जांच (urine test) |
बीटा एचसीजी जांच (beta hcg test) |
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प्रकार |
गुणात्मक - केवल हाँ/नहीं (प्रेगनेंसी है या नहीं) बताता है |
मात्रात्मक - खून में एचसीजी की मात्रा को दर्शाता है |
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सटीकता |
97 से 99% सही |
एचसीजी के कम स्तर का भी पता लगाया जा सकता है |
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अवधि |
पीरियड मिस होने के एक- दो सप्ताह बाद |
पीरियड मिस होने से एक सप्ताह पहले भी |
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जांच कहां होती है |
घर पर स्वयं कर सकते हैं |
पैथोलॉजी या अस्पताल में रक्त का नमूना जांच के लिए दी जाती है |
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गर्भावस्था की किन समस्याओं का पता चलता है |
सिर्फ प्रेग्नेंसी का पता चलता है |
इसमें प्रेगनेंसी के साथ-साथ गर्भपात के खतरे या एक्टोपिक प्रेगनेंसी का भी पता चलता है |
ऐसे में आईवीएफ उपचार द्वारा भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद गर्भावस्था एवं उससे जुड़ी समस्याओं को सटीकता से समझने के लिए बीटा एचसीजी ब्लड टेस्ट अधिक उपयोगी है।
बीटा एचसीजी (beta HCG test) एक प्रकार का ब्लड टेस्ट है जिसे भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद गर्भधारण या प्रेग्नेंसी की पुष्टि के लिए किया जाता है। यह सबसे सही और शीघ्र परिणाम देने वाला टेस्ट माना जाता है।
भ्रूण प्रत्यारोपण या implantation के बाद टेस्ट करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए अन्यथा रिपोर्ट गलत आ सकता है और इसके कारण आप अकारण तनाव और निराशा का शिकार होंगी। भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद शरीर में एचसीजी हार्मोन जिसे ह्यूमन कोरीयोनिक गोनेडोटरोपिन (human chorionic gonadotropin) कहते हैं,का स्तर कम रहता है जिसके कारण रिपोर्ट गलत आती है। कई बार रिपोर्ट नेगेटिव आ सकती है भले ही आप गर्भवती हों। कई बार प्रत्यारोपण के समय दी गई दवाओं के असर के कारण भी गलत रिपोर्ट आ सकता।
आरोपण अर्थात इंप्लांटेशन के पश्चात कुछ लक्षणों का होना बहुत ही सामान्य है जो अधिकतर महिलाओं में देखी जाती है लेकिन कई बार कुछ लक्षण ऐसे होते हैं की रोगी बहुत असहज महसूस करते हैं, ऐसे में
डॉक्टर से संपर्क करना बहुत जरूरी होता है आईए जानते हैं वे लक्षण कौन से हैं-
आइए जानते हैं कि कब डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
मिथक - हर महिला में ब्लीडिंग होती है।
सच नहीं, हर महिला में रक्तस्राव या ब्लीडिंग नहीं होती है। सिर्फ 15 से 30% महिलाओं में ही ऐसे लक्षण देखे जाते हैं ।
मिथक - क्रैंप मतलब प्रेगनेंसी पक्की है।
सच- नहीं, क्रैंप या पेट दर्द गर्भावस्था की पुष्टि नहीं करता है।
मिथक- लक्षण ना हो तो प्रेगनेंसी नहीं है।
सच- जी नहीं, कई बार कुछ महिलाओं में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन वे गर्भवती होती हैं।
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मिथक |
सच |
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हर महिला में ब्लीडिंग होती है |
नहीं, हर महिला में रक्तस्र या ब्लीडिंग नहीं होती है सिर्फ 15 से 30% महिलाओं में ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं |
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क्रैंप मतलब प्रेग्नेंसी पक्की है |
नहीं क्रैंप प्रेग्नेंसी की पुष्टि नहीं करता है |
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लक्षण ना हो तो प्रेग्नेंसी नहीं होती है |
जी, नहीं, कई महिलाओं में प्रेगनेंसी के बाद भी लक्षण नहीं दिखाई देते। |
शुरुआती लक्षणों के तौर पर आप हल्का दाग (Spotting), पेट में हल्की ऐंठन, स्तनों में भारीपन या थकान महसूस कर सकती हैं। लगभग 1-2 हफ्ते बाद, एक पॉजिटिव टेस्ट इस बात की पुष्टि कर सकता है कि इम्प्लांटेशन सफल रहा है।
हाँ, कुछ महिलाओं को हल्का दर्द और स्पॉटिंग पीरियड्स जैसी लग सकती है, लेकिन आमतौर पर यह बहुत हल्का और कम समय का होता है।
यह दर्द आमतौर पर पेट के निचले हिस्से या कमर के निचले हिस्से में महसूस होता है, जो बिल्कुल पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द (क्रैम्प्स) जैसा लगता है।
आमतौर पर ओव्यूलेशन के लगभग 6–10 दिन बाद (या IVF में ट्रांसफर के 5–10 दिन बाद) कुछ लक्षण दिख सकते हैं।
प्राकृतिक रूप से गर्भधारण (Natural Conception) में इम्प्लांटेशन की प्रक्रिया बिना किसी डॉक्टरी मदद के शरीर के अंदर अपने आप होती है। इसके विपरीत, IVF इलाज में भ्रूण (Embryo) को बाहर से गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है, और इस दौरान दी जाने वाली सहायक दवाओं का असर आपके लक्षणों पर पड़ सकता है।
इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग आमतौर पर बहुत हल्की, 1–2 दिन की, गुलाबी/भूरी होती है; जबकि पीरियड्स का फ्लो ज्यादा और लंबे समय का होता है।
यह आमतौर पर गहरा लाल होने के बजाय हल्का गुलाबी या भूरा होता है।
इंप्लांटेशन या प्रत्यारोपण वह प्रक्रिया है जिसमें अंडे निषेचित होने के बाद गर्भाशय की अंदरूनी सतह में जाकर चिपक जाते हैं और वहां स्थिर हो जाते हैं।
इंप्लांटेशन जिसे प्रत्यारोपण भी कहा जाता है के शुरुआत में रक्तस्राव, पेट के निचले हिस्से में दर्द, स्तनों में सूजन या कोमलता, थकान और कमजोरी के अलावा मनःस्थिति में अचानक परिवर्तन के लक्षण दिखाई देते हैं।
हां, प्रत्यारोपण की प्रक्रिया के बाद रक्तस्राव का होना सामान्य है।
जी हाँ, इंप्लांटेशन ब्लीडिंग और पीरियड्स की ब्लीडिंग दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं। इंप्लांटेशन की ब्लीडिंग या रक्तस्राव हल्की होती है, एक से तीन दिनों में ठीक हो जाती है और यह हल्के गुलाबी या भूरे रंग की होती है जबकि मासिक धर्म का रक्त स्राव अत्यधिक तीव्र होता है, यह तीन से सात दिनों तक रहता है और इसका रंग लाल होता है।
यह अंडे के गर्भाशय से चिपकने की प्रक्रिया ओवुलेशन के 6 से 12 दिन बाद होती है।
जी नहीं, हर महिला में इंप्लांटेशन के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं क्यों के लक्षण बिल्कुल नगण्य रहते हैं।
प्रत्यारोपण के बाद पेट में हल्का दर्द होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब अंडाणु गर्भाशय की दीवार से जाकर चिपकता है तो उसकी कोशिकाओं में संकुचन होता है जिसके कारण यह दर्द महसूस होता है।
जी हाँ, इम्प्लांटेशन के समय थकान महसूस हो सकती है। यह प्रत्यारोपण के समय इस्तेमाल की गई हार्मोनल दवाइयों के कारण भी हो सकता है।
गर्भधारण जांच या प्रेगनेंसी टेस्ट प्रत्यारोपण के लगभग 11 से 14 दिनों बाद करवाना चाहिए जिस रिपोर्ट के सही आने की संभावना अधिक होती है।
प्रत्यारोपण के बाद प्रेगनेंसी टेस्ट के द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि स्त्री गर्भवती है या नहीं। बीटा एचसीजी टेस्ट एक ब्लड टेस्ट है जो यह निर्धारित करता है कि महिला ने गर्भधारण सफलता पूर्वक कर लिया है अथवा नहीं।
जी नहीं इंप्लांटेशन के बिना प्रेगनेंसी संभव नहीं है क्योंकि यह वह प्रक्रिया है जिसमें अंडा गर्भाशय की दीवार से जाकर चिपकता है और यहीं से गर्भावस्था की शुरुआत होती है।
आईवीएफ में भी इंप्लांटेशन के लक्षण प्राकृतिक गर्भधारण जैसे ही होते हैं। हालांकि यह अलग-अलग महिलाओं में अलग-अलग दिखाई पड़ता है, किसी में कम या किसी में ज्यादा।
आमतौर पर स्पॉटिंग प्रेगनेंसी का संकेत हो सकती है लेकिन कई मामलों में स्पॉटिंग नहीं होती है इसका अर्थ यह नहीं कि वह महिला गर्भवती नहीं है।
जी हां इंप्लांटेशन के समय मूड स्विंग्स या मनोदशा में परिवर्तन होता है क्योंकि हार्मोन संबंधी उतार-चढ़ाव अधिक होता है।
इंप्लांटेशन के बाद कई प्रकार के बदलाव महसूस होते हैं जिनमें हल्की ब्लीडिंग या स्पॉटिंग, पेट दर्द या क्रैंप, स्तनों में कोमलता, सर दर्द ,जी मिचलाना एवं थकान और कमजोरी महसूस होती है।
यदि अत्यधिक तेज बुखार हो, अधिक मात्रा में रक्त स्राव हो रहा हो, पेट में सामान्य से अधिक पीड़ा हो रही हो, या फिर गर्भ के अपनी जगह से खिसक जाने का संदेह हो तो ऐसे में डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
हां इंप्लांटेशन में दर्द कुछ देर के लिए रहता है और यह हल्का होता है जबकि मासिक धर्म या पीरियड्स का दर्द बहुत तीव्र और कई दिनों तक रहने वाला होता है।
हां, बिना ब्लीडिंग के भी इंप्लांटेशन हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसा देखा गया है।
जी नहीं, (IVF) आईवीएफ के बाद भी इंप्लांटेशन या प्रत्यारोपण के लक्षण प्राकृतिक गर्भधारण के समान ही होते हैं हालांकि कई बार आईवीएफ प्रक्रिया से किए गए प्रत्यारोपण में लक्षणों की तीव्रता अधिक पाई जाती है।
इंप्लांटेशन के तुरंत बाद प्रेगनेंसी टेस्ट नहीं किया जाना चाहिए इसमें सही रिपोर्ट आने की कोई संभावना नहीं रहती है जो गर्भवती महिला में संदेह की स्थिति पैदा कर सकता है आमतौर पर 11 से 14 दिनों बाद ही गर्भधारण परीक्षण या प्रेगनेंसी टेस्ट करने की सलाह दी जाती है ताकि रिपोर्ट की सटीकता बनी रहे।